आज तेरे मैकदे में साकी, सुराही नहीं दिखती

आज तेरे मैकदे में साकी, सुराही नहीं दिखतीकहीं चिन्गारी नहीं दिखती, कहीं जिन्दगी नहीं दिखती।हरइक आवाज ऊँची थी, दूर तक गूँजती गई थीइस सन्नाटे के आगोश में खामोशी नहीं दिखती।मौत हर रोज दिखती है, लेकिन जिन्दगी नहीं दिखतीगुनाह की फेरिश्त में तड़पती जिन्दगी नहीं दिखती।इस कफस में बैठकर देखो ए सैयाद, मेरे दोस्त!तेरे कारनामों में रहम की निशानी नहीं दिखती।गुनहगारों में तू भी था, हर इक गुनाह करता हुआपर तेरे चेहरे पर खुदा! परेशानी नहीं दिखती।मुझे इस कदर रोता देखकर, तू बस हँसता रहाक्या तुझे इन आँसू में मेरी हैरानी नहीं दिखती।तू मुझमें समाया था, मेरे साथ तू भी फिरता थातुझे मैं ढूँढ़ता भी कहाँ मुझे रोशनी नहीं दिखती।…. भूपेन्द्र कुमार दवे00000

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3 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 23/03/2018
  2. Madhu tiwari 23/03/2018
  3. डी. के. निवातिया 24/03/2018

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