बेटी(कविता)

बेटी(कविता) बेटा है कुल दीपक , जिससे होता एक घर रौशन , दो कुल की रोशनी जिससे , बेटी है घर की रौनक . सुन लो ऐ दुनिया वालो … बेटी बोझ नहीं होती , समझे जो लोग बेटा-बेटी को सामान , उनकी निम्न सोच नहीं होती . बेटा है लाठी बुढ़ापे की,बस कहने को, बेटी है वास्तव में सहारा माता-पिता का . बेटा गर है अभिमान, बेटी गुरुर है माता-पिता का. बेटे गर हैं माता-पिता की आँखें , तो बेटी उनकी नाक(प्रतिष्ठा) है. बेटे तो मात्र एक घर /कूल की शान है . मगर बेटी दोनों कूलों (ससुराल-पक्ष व् मायका पक्ष ) दोनों की शान हैं . बेटी होती है पराया धन , मगर ”अपने ”बेटे से कहीं अधिक, अपना होता है वोह पराया धन . पास रहकर भी जो बेटा, माता-पिता के कष्टों से रहे अनजान . मगर सौ कौस की दूरी से भी माता-पिता , में जिसके बसते हैं प्राण . माता-पिता व् बेटी के जुड़े रहे एक तार से मन , ऐसी आत्मीयता ,ऐसी घनिष्ठता सिर्फ एक बेटी ही दे सकती है.

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5 Comments

  1. Bhawana Kumari 20/03/2018
  2. laxmi 20/03/2018
  3. डी. के. निवातिया 20/03/2018
  4. Shishir "Madhukar" 21/03/2018
  5. Madhu tiwari 21/03/2018

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