नव प्रभात के रूप

बीति रजनीतम से कोसों दूरदीप्तएक स्वच्छसुदृढ , सुह्रदउदय नवल प्रभातधरा पर आतीस्वर्णिम रश्मियाँतप-त्यागप्रखर-पुँज कीअनंत शक्ति कोकरती समाहितसौम्यता, सारगर्भित तथ्य को परखती !विभा की रश्मियाँ अनंत ब्रह्मांड सेआतीदीखाती सत्य – संधान कोविघटित संसाधन के भयावह रूप को !क्रूर ! निस्तेज !नहीं ! नहीं!तप-श्रेष्ठ सुगंधित पुण्य अवनी को,सस्य-मृदुता, कोमलता ,पुर्णता भरनेमानवता के प्रतिमूर्त्त रूप कोकरने साकारविघटन, पलायन के भयावहविध्वंस रोकने को !— कवि आलोक पाण्डेय

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