निर्लिप्त जड़ चेतन

निर्लिप्त जड़-चेतन—————————-एक कोनामेरा अपनाजंगल के कोलाहल मेंदिल की गहराइयों से शांतभूख अनगिनत रूपों मेंअभी भी बन कर हवामंडरा रही चहूँ ओर मगरखुद को खुदा से मिला रहा हूँ ।।रम गई सोच,सुस्त हुई अक्लहाँ! अब मैं पहुँच ही गया हूँ ।देख हवा! बन सखीधीरे से गुजरनाऐ पत्तो ! चुपके से सरसरानामेरे गुरु पेड़ के तने !तू यूँ ही मेरा साथ निभाना ।बस मैं सजीव सेतुझ जैसा जड़ ही हो चला हूँ ।।जीवन में घात,आघात,वार बहुत हैं ।तभी तो मैं तुझ सा हो जाना चाहता हूँ ।जो पाप-पुण्य की दौड़ थी ।।जो हार-जीत की बात थी ।।जो छोटे-बड़े की जात थी ।।छोड़ उसेमैं तुझ संग निर्लिप्त हो चला हूँ ।।ऐ जड़ तने! मैं पल भर मेंरह कर तुझ संग संत हो चला हूँ ।।।।मुक्ता शर्मा ।।

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5 Comments

  1. Brij mohan 12/03/2018
    • mukta mukta 12/03/2018
  2. Mamta sharma 13/03/2018
  3. C.M. Sharma C.M. Sharma 14/03/2018
    • mukta mukta 15/03/2018

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