देखो मातम है वहां

देखो मातम है वहां,उस सुनसान गली में,कोई रोने वाला नज़र नहीं आता,लोग कहता है बस्ती है वहाँ,इन झूठे इशारों का सफ़र,जिसकी मंजिल का निशाँ भी नहीं है वहाँ,संसार की बनाई रीत,मेरे कमर पर किसी कीड़े की तरह रेंगती हैउन आँखों की मुझसे उम्मीदमुझे ज़ंजीरो में जकड़ करकिसी सांप की तरहहड्डी को चूर कर पचाना चाहती हैनहीं मैं नहीं सो सकतागली में सोये उस सुवर की तरहजो कीचड़ में लोटने को स्वर्ग समझते हैनहीं मैं नहीं भर सकता उस रोटी से पेटजो बेमौसम बरसात में सड़े-बड़े दाम गेहूं से बनी हैनहीं में नहीं रह सकता उस छत के नीचेजिसकी तराई किसी बेजुबान मज़दूर के पसीने से हुई हैनहीं मैं नहीं घूम सकता उस वाहन मैंजो सड़क पर चलते हुए अकड़ कर पिल्लो को रौंद देती हैनहीं मैं नहीं खरीद सकता उस जिस्म कोजिसकी अस्मिता की सौगंद मुझे मेरी माँ ने दी हैहाँ ला सकता हूँ उन झुर्रियो पर हंसीजो पीली धुप में जल कर भीख मांगती हैहाँ सुना सकता हूँ उन्हें मैं कविताजिसके पास मनोरंजन का आधुनिक साधन नहीं हैहाँ ले सकता हूँ उस दर्द कोजो किसी चमार को चमार महसूस होने पर होता हैहाँ दे सकता हूँ झूठा दिलासायह कहकर उस बेवाह कोकी उसके पति को लाठियों से नहींचाकू के वार से मारा हैपिला सकता हूँ उस बिल्ली को दूधजो पड़ोस के किसी सेठ की पालतू हैपर अपने आप को भूखा देखकर ठगी महसूस करती हैदे सकता हूँ गाली उस सफेदपोश हत्यारे कोजिसकी किस्मत के तारे बुलंदी के भी पार हैकह सकता हूँ उस जाहिलजो अपनी हवस के कारणगरीबो की तादाद को बढाने में लगा हैकाट सकता हूँ उस पुरुष की नसों कोजो सड़क पर चलतीउस स्त्री के सख्ती से लिपटे वस्त्रको देखकर तनकर अपनी मर्दानगी खो देते हैमार सकता हूँ उसके जूतेजो अपने ही घर की औरत के तन कोऐसे देखता है जैसे कोई कुत्ताजो हमेशा जुड़े रहना चाहता हैजिसे भोला समाज मिलनसार कहता है.

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2 Comments

  1. arun kumar jha arun kumar jha 14/03/2018
  2. C.M. Sharma C.M. Sharma 14/03/2018

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