मानव कुल कितना जीता है

मानव कुल कितना जीता हैकुछ पल कुछ क्षण जीता है।मरने के पहले किश्तों मेंमरते मरते ही जीता है। जन्म समय हर शिशु रोता हैफिर हँसता है, मुस्काता हैआगे चिन्ता लिये हुए वहहँसता कम, रोता ज्यादा है। मानव कुल कितना जीता हैकुछ पल कुछ क्षण जीता है। मानव सबको ठुकराता हैविविध रूप से कलपाता हैखुद भी मुरझाया रहता हैमुस्कानों से कतराता है। मानव कुल कितना जीता हैकुछ पल कुछ क्षण जीता है। कोलाहल से डर जाता हैवीरानों में जा बसता हैत्याग सपन जब वह उठता हैआगे बढ़ने से डरता है। मानव कुल कितना जीता हैकुछ पल कुछ क्षण जीता है। सच है जो डरकर जीता हैना मरता है, ना जीता हैअपने इक जीवन में वह तोबार बार मरते जीता है। मानव कुल कितना जीता हैकुछ पल कुछ क्षण जीता है। चीख, खीज कर चिल्लाता हैबस बोझिल साँसें लेता हैवह पागल-सा उन्माद भराकुछ अनमन-सा बस जीता है। मानव कुल कितना जीता हैकुछ पल कुछ क्षण जीता है। वह अंध मूक बधिर बना-साअंधे युग में रम जाता हैजग मिथ्या में घुल-मिलकर बसवह मरता है ना जीता है मानव कुल कितना जीता हैकुछ पल कुछ क्षण जीता है। शून्य जगत में शून्य बना वहमात्र शून्य-सा जुड़ जीता हैऔर अनंत की ओर अंध-साअंधियारे में जा मिलता है। मानव कुल कितना जीता हैकुछ पल कुछ क्षण जीता है।… भूपेन्द्र कुमार दवे00000 

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  1. C.M. Sharma 10/03/2018

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