ग़ज़ल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

उनके दहलीज पर पाँव जमाना,अब जमाना लगता हैउनके तबस्सुम निगाहें नूर, कितना तराना लगता है। खुदा खैर करे, जिंदगी संवर जाये अपनी,उसे देखकर उनके खुद का पहरेदार भी, उनका दिवाना लगता है। उसे जन्नत की नूर कहूँ या फिर,कहूँ परियों की रानी चश्मे में चाँद उतर आए, ऐसा अफसाना लगता है। गुफ्तगू चलती रही और ख्याल संवरते बिगड़ते रहे उनके हर अंदाज, हर अदा कितना शायराना लगता है। दिवानगी,मुहब्बत के इंतहा में जलकर खाक होता रहा उनकी हर इक अदा,बिन्दु को,कितना दोस्ताना लगता है।

Оформить и получить экспресс займ на карту без отказа на любые нужды в день обращения. Взять потребительский кредит онлайн на выгодных условиях в в банке. Получить кредит наличными по паспорту, без справок и поручителей

13 Comments

  1. Kiran kapur Gulati 09/03/2018
    • Bindeshwar Prasad sharma 12/03/2018
  2. Bhawana Kumari 09/03/2018
    • Bindeshwar Prasad sharma 12/03/2018
  3. yogesh sharma 10/03/2018
    • Bindeshwar Prasad sharma 12/03/2018
  4. C.M. Sharma 10/03/2018
    • Bindeshwar Prasad sharma 12/03/2018
  5. bhupendradave 10/03/2018
    • Bindeshwar Prasad sharma 12/03/2018
  6. ANU MAHESHWARI 12/03/2018
    • Bindeshwar Prasad sharma 12/03/2018
  7. Bindeshwar Prasad sharma 12/03/2018

Leave a Reply