लक्ष्य संधान हो….

शीर्षक–लक्ष्य संधान हो…बहुत हुआअपरिचित हो कर जीवन जीनाअब कोई मनुष्य व्यर्थ न होनिज जीवन का कोई तो अर्थ होहर जीवन चरित्र को गुणगान होबस केवल और केवललक्ष्य संधान हो…है लिखी जाती नहीं गाथायेंकागजो पर काली स्याही सेरक्त भी कम पड़ते हैलिखने महापुरुष के गाथाओं कोइस धरा का हर मनुष्य महान होसम्पूर्ण भारतवर्ष का नवनिर्माण होबस केवल और केवल लक्ष्य संधान हो…बहुत हुआस्मिर्ति में शेष रहना अब हर अवशेष से निर्माण होआसमाँ में उड़ान होज़मीन पर पैरो के निशान होबस केवल और केवललक्ष्य संधान हो…है राहो में मुश्किलें बड़ी ठोकर खाने से जो ठिठक जाएऐसा कोई ना इंसान होचाहे जितने भी चले व्यंग्य बाण होलक्ष्य के लिए खड़ा हर इंसान होना व्यर्थ का अभिमान होबस केवल और केवल लक्ष्य संधान हो…… अभिषेक राजहंस

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3 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 27/02/2018
    • Abhishek Rajhans 28/02/2018
  2. Kajalsoni 03/03/2018

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