*बेटी-युग*

*बेटी-युग*…आनन्द विश्वाससतयुग, त्रेता, द्वापर बीता, बीता कलयुग कब का,बेटी-युग  के  नए  दौर  में,  हर्षाया   हर   तबका।बेटी-युग में खुशी-खुशी है,पर महनत के साथ बसी है।शुद्ध-कर्म  निष्ठा का संगम,सबके मन में दिव्य हँसी है।नई  सोच  है,  नई चेतना, बदला  जीवन  सबका,बेटी-युग  के  नए  दौर  में,   हर्षाया   हर  तबका।इस युग में  ना  परदा बुरका,ना तलाक, ना गर्भ-परिक्षण।बेटा   बेटी,    सब   जन्मेंगे,सबका   होगा  पूरा   रक्षण।बेटी की किलकारी सुनने, लालायत  मन सबका।बेटी-युग  के  नए  दौर  में,   हर्षाया   हर  तबका।बेटी भार  नहीं  इस  युग में,बेटी   है  आधी   आबादी।बेटा है कुल का दीपक, तो,बेटी है दो  कुल की  थाती।बेटी तो  है शक्ति-स्वरूपा, दिव्य-रूप है  रब  का।बेटी-युग  के  नए  दौर  में,   हर्षाया   हर   तबका।चौके   चूल्हे  वाली  बेटी,बेटी-युग में कहीं  न होगी।चाँद  सितारों से  आगे जा,मंगल पर मंगलमय  होगी।प्रगति-पंथ पर  दौड़ रहा है,  प्राणी हर मज़हब का।बेटी-युग  के  नए  दौर  में,   हर्षाया   हर   तबका।***…आनन्द विश्वास

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5 Comments

  1. C.M. Sharma 12/02/2018
  2. Shishir "Madhukar" 12/02/2018
  3. Madhu tiwari 12/02/2018
  4. Bindeshwar prasad sharma 12/02/2018
  5. Kajalsoni 16/02/2018

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