अशार

मेरे होटों पे अभी तक है तबस्सुम के सिलसिलेगयी रात मेरे ख्वाबों में वो जो हमसे आ मिलेमुझको तो एक पल की भी फुर्सत नहीं तुझसेतुझको कहाँ से है मुझसे इतने शिकवा-गिलेआये हो मेरे पास तो बैठो दो चार पलदो चार पल ही सही जीने को कुछ तो बहाना मिलेऐसे तो मेरे मर्ज़ की कोई दवा नहींवैसे अगर तू देख ले तो चेहरा मेरा खिलेमुनासिब है फासलें हो यूँ ही दरमियान अपनेकहीं क़ुर्बतों के बढ़ने से बढ़ जाए ना मुश्किलेंजिनको समझ रहा था मैं हमराज़ हमकदमबदली रुतें तो वो मेरे मुखालिफ से जा मिलेतेरे तस्सवुरात में कुछ भी न हो मेरे सिवामुझको मेरी वफ़ा का कुछ तो सिला मिले 

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10 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 11/02/2018
    • Nitin Pandey 12/02/2018
  2. Bindeshwar Prasad sharmaकक 12/02/2018
    • Nitin Pandey 12/02/2018
  3. C.M. Sharma 12/02/2018
    • Nitin Pandey 12/02/2018
  4. Madhu tiwari 12/02/2018
    • Nitin Pandey 16/02/2018
  5. Kajalsoni 16/02/2018
    • nitin pandey 23/04/2018

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