मैं रोज लगाता हूँ एक साँकल अपने ख्वाबों की दुनिया पर… फिर भी जाने कैसे किवाड़ खुले मिलते हैं… बेशक चरमराने की आवाज़ रोज होती हैवाकिफ और कर देता हूँ बंद हर दरवाज़े को….. आखिर दर्द की तहरीरें  कब तक बदलेंगी करवटें…बार बार की मौत से एक बार की मौत भली…मगर जाने कौन सी पुरवाई किस झिर्री से अंदर दस्तक देती हैऔर खुल जाती है साँकल ख्वाबों की दुनिया की धीमे से… और शुरू हो जाता है एक बार फिर आवागमन.. हवाओं का अगले ज़ख्म के लगने तक, दर्द के अहसासों के बढ़ने तक… मानव मन जाने किस मिटटी का बना है… मिटटी में मिलने पर भी ख्वाब बुनना नहीं छोड़ता… कितने जतन कर लो, कितनी सांकलें चढ़ा लो… ख़्वाबों की बया घोंसला बुनना जारी रखती है…निरंतर कर्मरत रहना कोई इससे सीखे…!!कपिल जैन

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4 Comments

  1. Kajalsoni 09/02/2018
    • कपिल जैन 20/02/2018
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 10/02/2018
  3. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharmaकक 11/02/2018

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