मीत.._अरुण त्रिपाठी

मीत(विधाता छंद)1222 1222 1222 1222सभी रिश्ते सभी नाते नहीं इसके बराबर हैं।दिलों के बीच बहता ये मचलता प्रेम सागर है।जहाँ में खुशनसीबी है कि जिसका मीत होता है।नवल यौवन लिये सुंदर सुहाना गीत होता है।अगर यूँ राह में चलते कहीं कुछ भूल हो जाये।दिलों के बीच में अपने कहीं जो शूल हो जाये।लगाओ यूँ गले उसको कलुष जज्बात घुल जायें।बहा दो प्रेम की धारा दिलों के दाग धुल जाये।जहाँ हो झूठ की बानी कहाँ समता ठहरती है।दगा यदि पूत देता है तभी ममता बिखरती है।दिलों में दूरियाँ जिनसे जला दें भाव वो सारे।न कोई दिल दुखे जग में नहीं कोई हृदय हारे।जलायें आज हम होली बुरे हर भाव जलने दें।बनी पाहन जमी मन पे परत ऐसी पिघलने दें।लगायें बादलों के पर गगन में आज उड़ जायें।अभी तक दूर जो भी थे दिलों के तार जुड़ जायें। -‘अरुण’

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15 Comments

  1. C.M. Sharma 30/01/2018
    • अरुण कुमार तिवारी 30/01/2018
  2. Shishir "Madhukar" 30/01/2018
    • अरुण कुमार तिवारी 30/01/2018
  3. डी. के. निवातिया 30/01/2018
    • अरुण कुमार तिवारी 30/01/2018
  4. Bhawana Kumari 30/01/2018
    • अरुण कुमार तिवारी 30/01/2018
  5. Anu Maheshwari 30/01/2018
    • अरुण कुमार तिवारी 30/01/2018
  6. Bindeshwar Prasad sharmaकक 31/01/2018
    • अरुण कुमार तिवारी 31/01/2018
  7. Kajalsoni 02/02/2018
    • अरुण कुमार तिवारी 02/02/2018
  8. Madhu tiwari 03/02/2018

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