ढूँढ़ता हूँ…._अरुण त्रिपाठी

*’तेरी कहानी ढूँढ़ता हूँ…**(ग़ज़ल)*अरकान 2122 2122 2122 2122वक्त के अखबार में तेरी कहानी ढूँढ़ता हूँ।उम्र के इस आइने में इक निशानी ढूँढ़ता हूँ।दौर मिट जाएँ भले मिटते नहीं जज्बात दिल के,ले चले उस दौर में फिर वो रवानी ढूँढ़ता हूँ।मौज में जल जाना बुझना कुछ मजा इस बात में है,आज मौसम फिर बना है आग पानी ढूँढ़ता हूँ।जब तेरी महफ़िल में लुटकर दूर बैठा रौशनी से,रात के शाये तले शामें सुहानी ढूँढ़ता हूँ।लोग अक्सर इस जहां में जान अपनों पर हैं देते,गैर पर मिटने की कूबत वो जवानी ढूँढ़ता हूँ।यूँ तो साँसें चल रही है जी रहा जीने की ख़ातिर,इक अदद, कटते समय में, ज़िंदगानी ढूँढ़ता हूँ। -‘अरुण'(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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17 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 24/01/2018
  2. अरुण कुमार तिवारी 24/01/2018
  3. Bhawana Kumari 24/01/2018
    • अरुण कुमार तिवारी 24/01/2018
  4. डी. के. निवातिया 24/01/2018
    • अरुण कुमार तिवारी 24/01/2018
  5. अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव 24/01/2018
    • अरुण कुमार तिवारी 24/01/2018
  6. C.M. Sharma 25/01/2018
    • अरुण कुमार तिवारी 25/01/2018
  7. ANU MAHESHWARI 25/01/2018
    • अरुण कुमार तिवारी 25/01/2018
  8. Kajalsoni 25/01/2018
    • अरुण कुमार तिवारी 29/01/2018
  9. Bindeshwar Prasad sharma 25/01/2018
    • अरुण कुमार तिवारी 29/01/2018
  10. अरुण कुमार तिवारी 29/01/2018

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