।। चिन्तन ।।

<img src="http://www.hindisahitya.org/wp-content/uploads/lalbahadur-shastri-300×219.jpg" alt="" width="300" height="219" class="alignnone size-medium wp-image-104892" />॥ चिंतन ॥जीवन में हर मानव के, अनुभव होते भिन्न भिन्न ।कोई संतुष्ट उपल्बधियों से, किंतु मन सदा रहता है खिन्न ॥ 1 ॥क्या खोया क्या पाया किसने, याद दिला सकता है कौन ।चिंतन इसका तब हो पाता, जब मन हो जाता हो मौन ॥ 2 ॥जीवन सरिता के प्रवाह में, पाने-खोने का क्रम चलता रहता । उपलब्धियाँ भूलतीं चार दिनों मे, खोने का दु:ख आजीवन रहता ॥ 3 ॥विधाता की इक अनमोल कृति, जो 'समय' कहलाती है ।उपलब्धियों पर लगवाती ठहाके, दु:ख मे रूदन कराती है ॥ 4 ॥केवल प्राप्तियों से मानव, चिंतक कदापि न बन सकता है ।न ही प्राप्ति की संजो स्मृतियाँ, आनंद से जीवन भर सकता है ॥ 5 ॥केवल दु:ख का प्रहार ही, चिंतन को गति है दे सकता ।केवल इसकी पीड़ा से ही, पीड़ित है चिंतक बन सकता ॥ 6 ॥कारण कष्ट का विस्मृति काल, दीर्घ काल तक रहता है ।जिसे स्मरण कर मानव, जीवन में चिंतन भर सकता है ॥ 7 ॥अनुभव स्मृतियों को कर एकत्रित, मानव बुद्धि से मथता है ।मंथन से जो घृत होता है प्रकट, वह जाकर चिंतन बनता है ॥ 8 ॥एकांत साधना की अग्नि प्रकट होती, तब जाकर घृत है प्रकट होता ।चिंतन का रूप कर धारण, बीती स्मृतियों को ढ़ोता ॥ 9 ॥किसी ने मातु-पिता बचपन में, किसी का दु:ख से टूटा दिल ।कोई संघर्षों की लिये याद, होता प्रसन्न कि मिली मंजिल ॥ 10 ॥घटनाक्रम जीवन के किसी को, सदा न रहने देते प्रसन्न ।न हीसर्वदा देते दु:ख, जिससे मन रहता अप्रसन्न ॥ 11 ॥महान चिंतकों के दु:ख भी, बड़े ही भारी होते हैं ।किन्तु उनके चिंतन भी, चिन्ता पर हावी होते हैं ॥ 12 ॥अनुभव है यह बतलाता, कि ईश्वर का न्याय है पारदर्शी ।किसी से ना करता पक्षपात, वह है सदा-सर्वदा समदर्शी ॥ 13 ॥किसी को दु:ख देने के पहले, करवाता है आभास ।मानव संकेत न समझता उसके, मन में रखता झूठी आस ॥ 14 ॥दार्शनिकों का चिंतन कहता, कि विश्व सकल है कौतूहलमय ।ऋषियों का चिंतन कहता है, यह जग है पूर्णत: मायामय ॥ 15 ॥यह एक झूठी माय़ा है, जो दिवास्वप्न दिखलाती है ।पल पल करती भ्रमित मानव को, नित नया रूप दिखलाती है ॥ 16 ॥सामान्य मानव के जीवन का, होता केवल इतना सार ।क्या खोया क्या पाया हमने, जीवन को कैसे किया पार ॥ 17 ॥यह भी चिंतन का अनुभव है कि, ईमान का फल मीठा होता ।यह भी चिंतन बतलाता है, ईमान अपना मानव रोता ॥ 18 ॥चिंतन से ऑसू झरते हैं, जब जाने वाले आते याद ।बीती स्मृतियाँ देतीं झकझोर, बीते दिनों को कर के याद ॥ 19 ॥यह सच है कि चिंतन कर मानव, केवल खोए हुए का करता ध्यान ।पर है 'चिंता' का प्रबल शत्रु, करो सदा इसका सम्मान ॥ 20 ॥चिंतन जब भी प्रकट हो मन में, धारा को प्रकट हो जाने दो ।नव सीख ही देकर जायेगा, व्यर्थ न इसको जाने दो ॥ 21 ॥ अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव

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5 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 23/01/2018
  2. Bindeshwar Prasad sharma 23/01/2018
  3. डी. के. निवातिया 24/01/2018
  4. Kajalsoni 25/01/2018
  5. AKHILESH PRAKASH SRIVASTAVA. 26/01/2018

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