भंवर से कश्ती लगेगी किनारे कैसे?

‘ग़ज़ल’ को कौन रख सका है, पहरे में ‘अरुण’ पलक झपकते बदल लेते हैं रुख ‘रदीफ़-काफिये’बया ने मुश्किलों से बनाया ‘घरौंदा’ अपना तूफां ने इक पल में उड़ा दिए तिनके-तिनकेछोड़कर चप्पू, ‘बूढ़े हाथों’ में, तुम निकल लिये भंवर से कश्ती लगेगी किनारे कैसे?अरुण कान्त शुक्ला 17/1/2018

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6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 18/01/2018
  2. C.M. Sharma 18/01/2018
  3. ANU MAHESHWARI 18/01/2018
  4. Madhu tiwari 18/01/2018
  5. डी. के. निवातिया 19/01/2018
  6. Kajalsoni 21/01/2018

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