अफ़सोस न कर – डी के निवातिया

अफ़सोस न कर

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मेरे वतन के हिस्से ये सौगात हर बार मिली है !कभी गूंगो की कभी बहरो की सरकार मिली है !!

किसी में हुनर सुनने का, किसी में सुनाने काआज इसी में उलझी राजनीति लाचार मिली है !!

अफ़सोस न कर दरिंदगी पर आज के दौर मेंखुद को देख तुझमे ही ह्या शर्मशार मिली है !!

जब जब भी उठे सवाल यंहा गुनाहगारो परसियासत बनकर उनकी पनाहगार मिली है !!

आ हम भी चलते है, कुछ दुआए बटोर लाते हैसुना है रब के दर खैरातियो की लार मिली है !!

मजहब का चोला पहनकर, ईमानदार मत बनतेरे जैसे कितनो की रूह यहां गुनेहगार मिली है !!

बात किस किस की करेगा “धर्म” इस बाज़ार मेंशैतान के हाथ खुदा की चौखट लाचार मिली है !!

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डी के निवातिया

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12 Comments

  1. C.M. Sharma 17/01/2018
    • डी. के. निवातिया 27/01/2018
  2. Rajeev Gupta 17/01/2018
    • डी. के. निवातिया 27/01/2018
  3. Shishir "Madhukar" 18/01/2018
    • डी. के. निवातिया 27/01/2018
  4. ANU MAHESHWARI 18/01/2018
    • डी. के. निवातिया 27/01/2018
  5. Madhu tiwari 18/01/2018
    • डी. के. निवातिया 27/01/2018
  6. Kajalsoni 21/01/2018
    • डी. के. निवातिया 27/01/2018

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