काहे भरमाये — डी के निवातिया

काहे भरमाये

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काहे भरमाये, बन्दे काहे भरमायेनवयुग का ये मेला हैबस कुछ पल का खेला हैआनी जानी दुनिया केरंग मंच पे नहीं तू अकेला हैमन मर्जी से सब चलते जब,फिर तू ही, काहे घबराये, बन्दे काहे भरमाये !!

कहने को सब साथ साथ हैनहीं किसी के कोई हाथ हैदुनियादारी में फँसने काबहाना आज आम बात हैकुछ भी करके, कुछ भी कह लेकौन भला बंदिश लगाये,फिर तू ही, काहे घबराये, बन्दे काहे भरमाये !!

कौन है राजा, कौन है प्रजाअपने सर पर खुद का कर्जाभूखो की हम तब सोचेंगेपहले पेट जो, अपना भर जासाम, दाम, दंड, भेद, लगाकरअपना वर्चस्व सब जमाये !फिर तू ही, काहे घबराये, बन्दे काहे भरमाये !!

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डी के निवातिया

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18 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma 16/01/2018
    • डी. के. निवातिया 24/01/2018
  2. Shishir "Madhukar" 16/01/2018
    • डी. के. निवातिया 24/01/2018
  3. md. juber husain 16/01/2018
    • डी. के. निवातिया 24/01/2018
  4. Rajeev Gupta 16/01/2018
    • डी. के. निवातिया 24/01/2018
  5. Bhawana Kumari 16/01/2018
    • डी. के. निवातिया 24/01/2018
  6. Kajalsoni 16/01/2018
    • डी. के. निवातिया 24/01/2018
  7. अरुण कुमार तिवारी 16/01/2018
    • डी. के. निवातिया 24/01/2018
  8. C.M. Sharma 17/01/2018
    • डी. के. निवातिया 24/01/2018
  9. ANU MAHESHWARI 18/01/2018
    • डी. के. निवातिया 24/01/2018

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