शब्द विवेचन- मेरा आईना- प्रेम

शब्द विवेचन – “प्रेम”

 

शब्द माला के “प” वर्ग के प्रथम और व्यंजन माला के इक्कीस वे अक्षर के साथ स्वर संयोजन के बना “अढाई अक्षर” का शब्द “प्रेम” स्वंय में वृहद् सार को समेटे जीवन को परिभाषित करती एक परिभाषा है, जिसका विस्तृत स्वरूप अनन्य है !

जैसा की उच्चारण से ही प्रतीत होता है की (पर+एम्) अपने आप में संकीर्ण होते हुए भी व्यापक है (पर अर्थात दूसरा या अन्य और एम् का सम्बन्ध अंग्रेजी भाषा में किसी प्रयोजन या उद्देश्य से माना जाता है) सामान्य भाषा में समझा जाए तो दुसरे के लिए किये गए प्रयोजन का अभिप्राय ही प्रेम कहा जा सकता है !प्रेम अपने आप में एक अनुभूति है जिनमे कई प्रकार की भावनाओ के मिश्रण का समावेश है , यह पारस्परिक मनोवेग से आनंद की और विस्तृत होता है ! जिसमे दृढ आकर्षण के साथ आपसी सामंजस्य व् लगाव की भावना निहित होती है ! सामाजिक परिवेश की पृष्भूमि के तहत इसको विभिन्न रूपों में विभाजित किया जाता रहा है ! जिसके मुख्य पहलुओं में सम्बन्धी, मित्रता, रोमानी इच्छा और दिव्य प्रेम आदि है !आम तौर पर यह शब्द एक अहसास की अनुभूति करता है जो एक प्राणी से दुसरे के प्रति होती है ! प्रेम अर्थात प्यार को हम कई प्रकार से देख सकते है जैसे निर्वैयक्तिक रूप में या पारस्पारिक रूप में हालांकि (निर्वैयक्तिक या अवैयक्तिक एवं पारस्पारिक ) इन शब्दों की व्याख्या अपने आप में विस्तृत है जो अलग चर्चा का विषय है ! हम अपने शब्द “प्रेम” की और आगे बढ़ते है !प्रेम या प्यार के यदि आधार को समझने की कोशिश की जाए तो इसमें भी कई भेद सामने आते है, जिनमे प्रमुख जैविक, मनोवैज्ञानिक, या विकासवादी विचारधारा के अनुरूप हो सकता है ! जैविक आधार पर प्रेम जीवन के यौन प्रतिमान के आकर्षण का प्रतिबिम्ब है जो भूख, वासना, आसक्ति, उत्साह के वेग प्रदर्शित करता है, वही मनोवैज्ञानिक आधार पर प्रेम सामाजिक घटनाक्रम से जुड़ा होता है जिसमे एक आशा, प्रतिबद्धता व् आत्मीयता का भाव जुड़ा होता है ! और विकासवादी आधार पर प्रेम जीवन यापन के आधारभूतो के अनुरूप अपना स्थान लेता है !प्रेम के दृष्टिकोण अलग अलग हो सकते है कोई व्यवहारिक रूप में देखता है कोई दार्शनिक रूप में देख सकता है, किसी के लिए सियासी लाभ हानि का कारक हो सकता है, कोई रूहानी ताकत से देखता है, तो कोई सामरिक समरसता की दृष्टि से आदि आदि !अंतत: प्रेम आपने आप में एक अनुभूति है जो सात्विकता से ग्रहण करता है उस प्राणी में कुछ पाने की लालसा का अंत हो जाता है! मात्र समर्पण भावो में लिपटकर सवयं से दूर हो जाने की अवस्था तक जा सकता है !विस्तृत रूप में जितना विन्यास किया जाए कम लगता है, इसका व्यापक दृष्टिकोण है जो वृहद् चर्चा का विषय हो सकता है! यहां मात्र एक शब्द विवेचन के रूप में इसे समझने का सूक्ष्म सा प्रयास है ! प्रस्तुति विवेचक : – डी के निवातिया

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10 Comments

  1. Bindeshwar Prasad sharma 12/01/2018
    • डी. के. निवातिया 20/01/2018
  2. Kajalsoni 13/01/2018
    • डी. के. निवातिया 20/01/2018
  3. Shishir "Madhukar" 13/01/2018
    • डी. के. निवातिया 20/01/2018
  4. C.M. Sharma 15/01/2018
    • डी. के. निवातिया 20/01/2018
  5. Madhu tiwari 19/01/2018
    • डी. के. निवातिया 20/01/2018

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