ग़ज़ल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

फिसलते फिसलते फिसल गयी जिंदगी मौत से ही पहले उलझ गयी जिंदगी। हम तो यादों में ही बहकर रुक गये मेरे अरमानो को निगल गयी जिंदगी। था सहारा जिसका नहीं आया अबतक आस में ऐसे ही निकल गयी जिंदगी। वक्त के आगे हम भी हारकर रह गये सूरज जैसा शाम को ढल गयी जिंदगी। भरोसा अब ना रहा किसी का ऐ बिन्दु अपनो से मुंह फेर कर छल गयी जिंदगी

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6 Comments

  1. Bhawana Kumari 10/01/2018
  2. डी. के. निवातिया 11/01/2018
  3. Kajalsoni 11/01/2018
  4. Shishir "Madhukar" 11/01/2018
  5. C.M. Sharma 12/01/2018

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