वतन से जान जोड़ दी मैंने

नजाकत छोड़ दी मैंने , अदावत छोड़ दी मैंनेकोई न दर्द पलता अब , जो चाहत छोड़ दी मैंने

जो राहें जाती है तुझ तक , बहुत तड़पन अब देती हैन गुजरता हूँ अब उनसे मैं , वो राहें छोड़ दी मैंने

कहीं माली गया है तो , फूल कोई चुप के से तोड़ा हैअकेले फूल से न भरता मन , वो डाली तोड़ दी मैंने

अज़ीयत ने बताया है , कि पराया कौन है कौन अपनादेख के इस करिश्में को , फितरत में नफरत जोड़ दी मैंने

तेरे दीदार को तरसते थे , अंगारे तन बदन में भडकते थेअब बड़ा ही शांत दिखता हूँ , वो हरकत छोड़ दी मैंने

“मनु” के दिल मे न कोई , “मनु” के मन में न कोईमुनाफा लगता है मुझको अब , वतन से जान जोड़ दी मैंने

 कवि – मनुराज वार्ष्णेय

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13 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 06/01/2018
  2. Madhu tiwari 07/01/2018
  3. डी. के. निवातिया 08/01/2018
  4. Kajalsoni 08/01/2018

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