हमें अंग्रेजी नहीं आती

जुबां पर क्यों तुम्हारे अब , मेरी कोई बात नही आतीमगर तुम्हारी याद के बिन , हमारी कोई रात नहीं आती

अंग्रेजी में कभी जो तुम , दिखाती हो हमें नखरेनासमझ हम यूँ हँसते है , कि हमे अंग्रेजी नही आती

खता क्या मेरी ऐसी थी , जो तुम दिले दरार कर गएमौन हो दिल अब रोता है , कोई आवाज नही आती

तुम जो रुखसत हो गए , तो खिन्न सब सार हो गएकोई भी सुर न मिलता अब , मधुर कोई तान नही आती

वफ़ा की आड़ में तुम जो , बेवफाई का खेल खेलती होदिले पत्थर को तुम्हारे , कभी लज्जा नही आती

फटे रुखसार हो गए , कोई अब मुस्कान नही आतीफड़कता दिल ये रहता है , मगर कोई जान नही आती

 कवि – मनुराज वार्ष्णेय

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8 Comments

  1. डी. के. निवातिया 03/01/2018
  2. C.M. Sharma 04/01/2018
  3. Kajalsoni 04/01/2018
  4. Madhu tiwari 05/01/2018

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