कितना कुछ बीत गया

कितना कुछ बीत गयाबीतते साल के साथयही तो है समय की रफ़्तारजब चलती रही घड़ीऔर बीतता रहा समयक्या-क्या नहीं हुआ बीतते साल के साथकभी बहती रही पवन पुरबाईकभी धूप खिली अलसाईकभी खुशियाँ थी झोली भरीकभी आँखों ने नीर भी बहाईकितना कुछ बीत गयाबीतते साल के साथबीतते साल के कुछ चेहरे तस्वीर बन के रह गएकुछ अपने बस यादों में रह गएकभी किसी से नजदीकियांतो कभी किसी से दूर कर गएकुछ हिसाब पुरे हुएकुछ नए साल के भरोसे रहेकुछ रिश्ते उलझा गएकुछ जीना सीखा गए—अभिषेक राजहंस

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4 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma 02/01/2018
  2. डी. के. निवातिया 02/01/2018
  3. Kajalsoni 04/01/2018
  4. Madhu tiwari 05/01/2018

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