पहचान

मैं औरत हूँकमजोर,लाचार,बेजारकहाँ जीती मैं ज़िन्दगी अपनीकहाँ लेती साँसे खुद सेमेरी साँसो से भी हैं सबको इनकारमेरी साँसे तो होती हैकिसी ना किसी का उपकारमैं औरत हूँसदियों से चली आ रहीपुरुश्वाद का शिकारयहाँ अपने ही करते मेरा तिरस्कारमेरा जन्म लेना भीकहाँ किसी को स्वीकारगर दो कदम चलूँ भी तो चलूँ किधरघर की चौखटों को भी हैखुद के लांघे जाने से इनकारमैं औरत हूँडरी-सहमी सीखुद कहाँ कोई पहचान मेरीकभी पिता का नामतो कभी पति का सिन्दूररिस्तो के बंधन में बंधने को मजबूरहे ! विधाता तूने जन्म क्यों दियाआखिर क्या है मेरे होने का कसूरमैं औरत हूँपुरुषत्व की पहचानपुरुष समझते मुझे सजावट का सामानयहाँ कहां किसी को मेरा मानकहां मिलती है मुझे पहचानकहाँ होता मेरा सम्मानहे ! विधाताक्यों होता मेरा अपमानपुरुषो से ही मिलती रहेगीक्या मुझे मेरी पहचान———अभिषेक राजहंस

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12 Comments

  1. Madhu tiwari 24/12/2017
    • Abhishek Rajhans 25/12/2017
  2. Bindeshwar Prasad sharma 24/12/2017
    • Abhishek Rajhans 25/12/2017
  3. Bhawana Kumari 24/12/2017
    • Abhishek Rajhans 25/12/2017
  4. Kajalsoni 24/12/2017
    • Abhishek Rajhans 25/12/2017
  5. C.M. Sharma 25/12/2017
  6. Dknivatiya 25/12/2017
  7. Shishir "Madhukar" 27/12/2017

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