तन्हां इस शहर में नहीं कोई शख्स

तन्हां इस शहर में नहीं कोई शख्सतन्हाई आये भी तो कैसे आये उनके पाससुबह होती है जिनकी, शाम की रोटी की फ़िक्र के साथ ,तन्हां इस शहर में नहीं कोई शख्स ‘अरुण’फ़िक्र-ओ-गम की बारात है सबके साथ,पीठ पर लादे प्लास्टिक का थैला, नहीं वो अकेलाभोंकते कुत्तों की फ़ौज, पीछे पीछे है उसके साथ,’सुबह’ जब भी होगी, बहुत खूबसूरत होगीसोते हैं हर रात इस ख्वाहिश के साथ,प्यार-ओ-रोमांस के गीत भी गायेंगे एक दिनअभी तो खड़े हैं मजलूमों के साथ,अरुण कान्त शुक्ला21/12/2017

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9 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 21/12/2017
  2. डी. के. निवातिया 21/12/2017
  3. अरुण कुमार तिवारी 21/12/2017
  4. ANU MAHESHWARI 21/12/2017
  5. C.M. Sharma 22/12/2017
  6. अरुण कान्त शुक्ला 22/12/2017
  7. Kajalsoni 22/12/2017
  8. Bindeshwar prasad sharma 23/12/2017

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