अपने हाथों जां लुटानी, और है…सी. एम्. शर्मा (बब्बू)…

इश्क़ मेरे की कहानी, और है…तेरे ज़ख्मों की निशानी, और है…रूह मेरी की तलब बस, एक तू…खुशबु तेरी जाफरानी, और है….दिल का दिल से मिलना था, इक हादसा…अपने हाथों जां लुटानी, और है…हो चुकी मैयत सजानी भी मेरी…एक उनकी ही अगवानी, और है…’चँदर’ लुट के कर सुकूँ, ये इश्क़ भी…अब बराये महरबानी और है….ये रदीफ़ ग़ज़ल उसी का काफिया..ग़ालिब की अंदाज़-ए-ब्यानी, और है…\/सी. एम्. शर्मा (बब्बू)(जनाब ग़ालिब साहब की एक ग़ज़ल है….कोई दिन ग़र ज़िंदगानी और है…हमने अपने जी में ठानी और है…इसी ज़मीन पे लिखी ये ग़ज़ल है मेरी…आप सब की नज़र…)

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20 Comments

  1. Rajeev Gupta 20/12/2017
    • C.M. Sharma 21/12/2017
  2. Shishir "Madhukar" 20/12/2017
    • C.M. Sharma 21/12/2017
  3. ANU MAHESHWARI 20/12/2017
    • C.M. Sharma 21/12/2017
    • C.M. Sharma 21/12/2017
  4. डी. के. निवातिया 20/12/2017
    • C.M. Sharma 21/12/2017
  5. Bhawana Kumari 20/12/2017
    • C.M. Sharma 21/12/2017
  6. अरुण कुमार तिवारी 21/12/2017
    • C.M. Sharma 21/12/2017
    • C.M. Sharma 22/12/2017
  7. अरुण कान्त शुक्ला 21/12/2017
    • C.M. Sharma 22/12/2017
  8. Kajalsoni 21/12/2017
    • C.M. Sharma 22/12/2017

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