मानसिकता – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

मर्द का खाना औरत का नहाना कोई देखता कोई नहीं अब सब उल्टा पुल्टा रात में जागते हैं दिन चढ़ते सोते हैं किसी का कोई नहीं सुनता सब जगह टाल मटोल सब को लगी है जल्दी आज का काम कल पर छोड़ दिया मानसिकता बदल रही निकम्मेपन की लत सर चढकर बोलने लगा नहीं चाहता कोई काम करना गिरफ्त में उसके ही होकर रह गये आलस्य सर चढकर बोलने लगा देखा देखी बुरी सी हाल हो गयी तीन छोड़कर तेरह में पड़ गये बढ़ती जा रही अब यह परेशानियां मानसिकता अब कमजोर पड़ती जा रही हम जीतकर भी हारते नजर आ रहे चापलूसी धोखाधड़ी के शिकार बनते चले जा रहे अपनी करनी का अब खुद ही जिम्मेदार बन गयेहोनहार के पैर भी हम ही खींच रहे चकाचौंध में यह जिंदगी उलझती चली गयी लोभ क्रोध में फंस गए हम जान बूझकर अंजान बन गये धिक्कार है कि हम भी……. ।

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