संशयता -प्रशान्त तिवारी

चिड़ियों का गण हर नयी सुबह दाने को चुगने चलता है,हर पथिक अथक फिर से अपनी मंजिल पर आगे बढ़ता है। हर पग पर बधाओं के संकट रह-रह कर मंडराती है, जब दिवस ढले मंजिल ना मिले संशयता फिर गहराती है। कड़क धूप में दिन चढ़ते ही नदियां भी तो अलसाती है, पर लहरें बिन बलखाये ही बस शांत-शांत बह जाती है। हर डगर-डगर, हर ठहर-ठहर, आकर्षण बस उकसाती है, जब दिवस ढले मंजिल ना मले संशयता फिर गहराती है। सांझ को मन में व्यथा लिए हर राही घर को चलता है, सूरज भी चमक समेटे अपनी जल्दी-जल्दी ढलता है। कोई राज छिपा है जो मन में निर्भयता फिर खो जाती है, जब दिवस ढले मंजिल ना मिले संशयता फिर गहराती है।

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8 Comments

  1. C.M. Sharma 11/12/2017
    • प्रशान्त तिवारी 11/12/2017
  2. Bindeshwar Prasad sharma 11/12/2017
    • प्रशान्त तिवारी 11/12/2017
  3. डी. के. निवातिया 11/12/2017
    • प्रशान्त तिवारी 11/12/2017
  4. Shishir "Madhukar" 12/12/2017
    • प्रशान्त तिवारी 12/12/2017

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