खुद को तोड़ ताड़ के 

कब तक चलेगा काम खुद को जोड़ जाड केहर रात रख देता हूँ मैं, खुद को तोड़ ताड़ के ||तन्हाइयों में भी वो मुझे तन्हा नहीं होने देताजाऊं भी तो कहाँ मैं खुद को छोड़ छाड़ के ||हर बार जादू उस ख़त का बढ़ता जाता हैजिसको रखा है हिफ़ाजत से मोड़ माड़ के ||वैसे  ये भी कुछ नुक़सान का सौदा तो नहींसँवार ले खुद को वो अगर मुझको बिगाड़ के ||खुशबू न हो मगर किसी को ज़ख्म तो न देतुलसी लगा लूँ आँगन में गुलाब उखाड़ के ||

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10 Comments

  1. Madhu tiwari 10/12/2017
  2. Dknivatiya 10/12/2017
    • shivdutt 11/12/2017
  3. C.M. Sharma 11/12/2017
  4. Bindeshwar Prasad sharma 11/12/2017
  5. अरुण कान्त शुक्ला 11/12/2017
  6. जितेश सैनी 03/01/2019

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