प्रकृति और अन्धेरा

प्रकृति और अन्धेरा प्रकृति और अन्धेरे काहुआ है अद्भूत मेल,गौधूली के समय से हीलगे हैं खेलने अपना खेल ।कभी लेता आगोश में अपनेकभी चूमता इसका तनछा जाता है इसके ऊपरढक लेता सारा मधुबनपेड़ पौधे हरियाली सारीरंग जाती इसके रंग मेंलगा कर सिरपे अपने तेल ।गौधूली के समय से हीलगे हैं खेलने अपना खेल ।जीव जन्तु निकलते हैं बाहरजब आता अन्धेरे पर निखारघुम-घुम कर ही ये जन्तुदेते हैं अपनी रात गुजारपेड़ पौधे सारे चुप्पी साधेदेखते हैं मधुर मिलन कोपेड़ों से चिपक जाती हैं बेल।गौधूली के समय से हीलगे हैं खेलने अपना खेल ।ज्यों-ज्यों जवां होती है रातजो प्रेमीजन नही होते पास,रोते हैं मधुर मिलन को देखउठा आसमान में हाथछत पे सीधे लेटे हुएदेखते आसमान के तारों कोमन में नही होता उनके चैनगौधूली के समय से हीलगे हैं खेलने अपना खेल ।-0-

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  1. डी. के. निवातिया 07/12/2017

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