अन्जान हूँ

अन्जान हूँ न कोई मंजिल है मेरीना ही कोई घर है,मैं इस शहर में आनेवालाएक शख्श अन्जान हूँ।मेरी मंजिल कांटो भरीशहर ये जंगल जैसा हैरास्ता ना कोई सूझेइस जंगल में अन्जान हूँ।मैं इस शहर में आनेवालाएक शख्श अन्जान हूँ।सर पर छत है पेड़ों कीनीचे खतरा जीवों काजाऊं तो जाऊं कहां मैंजंगल का मेहमान हूँ।मैं इस शहर में आनेवालाएक शख्श अन्जान हूँ।आँखे निस्तेज डरी हुई सीभय थिरकन से भरी हुई सीखतरा हर पल लगा हुआ सागले में अटकी जान हूँ।मैं इस शहर में आनेवालाएक शख्श अन्जान हूँ।-0-

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  1. Arun Kant Shukla अरुण कान्त शुक्ला 07/12/2017

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