आहत ग्रामवासिनी मर्माहत कल ! – आलोक पाण्डेय

उम्र बीत गयी ज्यों दासता के तले,मरकर यों ही ना दु:ख भूलाया कभी ,मरना , है जीवन की एक दृढ कड़ीदेखा एक मरा है , अभी-अभी ! जीवन की संघर्षों की गाथा सुने बहुत, भला खुले मन से भूला याद आया कोई, क्यों याद आयेगा , क्या पड़ी याद करने कोक्या सोचना, है न फालतू! फिर गया है कोई !पर मैं कहाँ भूल सकता उन्हें,उजड़ते हर माँ की सिन्दूर-सुहाग,डूबते नन्हे,अप्रतिम त्याग,और उन अनंत शौर्य को,उन मधुर चाहतों को ,उनके माधुर्य को !देश डूब रहा गाँव जल रहा है,अन्याय और हिंसा खूब चल रहा है ,छल-प्रपंच का दौर, सत्य ढल रहा है ,बेबस, लाचार सर्वत्र सत्य रो रहा है ! यहाँ देखते नहीं क्या कितने बली, हैं बली धन के ,कहाँ चरित्र ? हैं खली; सूना आज आह लेकर असहायों के, हाय – हाय , आह लूट लिया है छली ! छद्म आलम्बन सत्य शोधक दीखे,नीति-न्याय के संवाहक और भी सदय सरीखेगाँव लूटे ,मिली सब साधु -उद्दण्ड पारीखे,फटती छाती धरा के, दुखिया धीरज रखे ! रो रही सरीता का निर्मल पावन जल… रो रहा वृक्ष यों ही हो दु:खित सजल, पशु-प्राणी आहत , आज ! मर्माहत कल ;आहत ग्रामवासिनी , फटती छाती विकल !मर रहे जो सदा, सत्य-पथ के पथी,दासता में बंधे कितने,कितने लथपथी !मर जाना तू भी सत्य हेतू हे धर्मरथी ,विपत्तियों से घिरा ‘आलोक’ है खड़ा सारथी ! ना होना निराश , हताश भी क्यों,लूट ले तूझे अपने, आक्रांता बन ज्यों ,मुस्कुरा ! मुस्कुरा !! मुस्कुरा वीर यों ;है देख प्रतिपल खड़ा भारत-आलोक ज्यों !हे वीर ह्रदय ,हे सजल सदय,बोलो भारत माता की जय !बोलो भारत माता की जय !!!© कवि आलोक पाण्डेय

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2 Comments

  1. C.M. Sharma 04/12/2017
  2. डी. के. निवातिया 04/12/2017

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