मुझे पैग़ाम मिल जाता है – शिशिर मधुकर

मुझसे बात करके तुम जो इतना खिलखिलाती हो अरे जज़्बात अपनी प्रीत के नाहक छुपाती हो तुम्हारा रूप वो मुझको सदा बेचैन करता है शर्म से पल्लू का कोना जो तुम मुँह में दबाती हो करा इकरार तुमने पर कभी मुँह से नहीं बोला मुझे पैग़ाम मिल जाता है जब नज़रें झुकाती हो तुन्हें मालूम होता है कि मैं तुमको मनाऊंगा तभी मुझको सताने को ही तुम नखरे दिखाती हो कई मय आजमाईं पर नशा होता ना था मधुकर मुझे ना होश रहता है नज़र से जब पिलाती हो शिशिर मधुकर

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12 Comments

  1. Abhishek Rajhans 03/12/2017
    • Shishir "Madhukar" 04/12/2017
  2. C.M. Sharma 04/12/2017
    • Shishir "Madhukar" 04/12/2017
  3. डी. के. निवातिया 04/12/2017
    • Shishir "Madhukar" 04/12/2017
    • Shishir "Madhukar" 04/12/2017
  4. अरुण कान्त शुक्ला 05/12/2017
    • Shishir "Madhukar" 06/12/2017
  5. Anu Maheshwari 08/12/2017
    • Shishir "Madhukar" 08/12/2017

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