जब भी – शिशिर मधुकर

जब भी मौसम ज़मीं पे अपनी फितरत को बदलते हैं मिलन की आस में यारां दिल के अरमान मचलते हैं किसी तपते बदन को जब जब फुहारें ठण्ड देती हैं ये बंधन प्यार के एक दूजे की बाहों में फिसलते हैं अब तो सूरज हुआ मद्धिम और रातें भी ठिठुरती हैं उनके आगोश की गर्मी से अब हम ना निकलते हैं जब खिले फूल बगिया में और मौसम भी अलसाया जाम पी के उनकी आँखों से हम हर पल संभलते हैं भरी गर्मी का मौसम है और वो नहीं पास में मधुकर घनी ज़ुल्फ़ों की छाया को तरसते हम तन्हा उबलते हैं शिशिर मधुकर

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10 Comments

  1. Abhishek Rajhans 29/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 29/11/2017
  2. C.M. Sharma 29/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 29/11/2017
  3. Ram Gopal Sankhla 29/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 29/11/2017
  4. अरुण कान्त शुक्ला 29/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 29/11/2017
  5. डी. के. निवातिया 01/12/2017
    • Shishir "Madhukar" 02/12/2017

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