पीढ़ियाँ पर बढ़ेंगी इसी राह पर आगे

कोट के क़ाज में फूल लगाने सेकोट सजता हैफूल तो शाख पर ही सजता है,क्यों बो रहे हो राह में कांटेतुम्हें नहीं चलनापीढ़ियाँ पर बढेंगी, इसी राह पर आगे,तुम ख़ूबसूरत हो, मुझे भी दिखे हैख़ूबसूरती के पीछेहै जो छिपा, वो भी दिखे है,मैं न हटाता चाँद सितारों से नजरेंपर क्या करूँधरती से उठती नहीं, अश्क भरी नजरें,मेरे गीत खुशियों से भरे पड़े हैंमेरे साथ सिर्फबुलंद आवाज में उन्हें, तुम्हें गाना होगा,जब भी सख्त हुए पहरे गीतों परगाये लोगों नेइंक़लाब के गीत, और बुलंद आवाज में,रास्ते मुसाफिर को कहीं नहीं ले जातेचलना पड़ता हैकांटों पर, मुसाफिर, मंजिल पाने के लिए,अरुण कान्त शुक्ला, 19/11/2017

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10 Comments

  1. Anu Maheshwari 20/11/2017
    • अरुण कान्त शुक्ला 21/11/2017
  2. C.M. Sharma 20/11/2017
    • अरुण कान्त शुक्ला 21/11/2017
  3. Kajalsoni 20/11/2017
    • अरुण कान्त शुक्ला 21/11/2017
  4. डी. के. निवातिया 20/11/2017
    • अरुण कान्त शुक्ला 21/11/2017
  5. Shishir "Madhukar" 21/11/2017
    • अरुण कान्त शुक्ला 21/11/2017

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