किस काम की सांसें – शिशिर मधुकर

मुहब्बत छोड़ दी तुमने– मेरा सुख चैन खोया है बचे ना अब तो आंसू भी ये मनवा इतना रोया है हर तरफ आग नफरत की मेरा तन मन जलाती है ना जाने किस अरि ने राहों में –कांटों को बोया हैचले थे कारवाँ के संग —–सकूं पाने की चाहत में मुसाफिर कोई भी लेकिन यहाँ पल भर ना सोया है फूल कितने भी सुन्दर हो खुद ही से जुड़ नहीं सकते प्रेम धागे ने ही ——-उनको तो माला में पिरोया है प्रेम जीवन में ना हो मधुकर तो किस काम की सांसें समझ लो मिट्टी की काठी को तब नाहक़ ही ढोया हैशिशिर मधुकर

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12 Comments

  1. ANU MAHESHWARI 18/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 18/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 18/11/2017
  2. Kajalsoni 19/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 19/11/2017
  3. Arun Kant Shukla 20/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 21/11/2017
  4. C.M. Sharma 20/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 21/11/2017
  5. डी. के. निवातिया 20/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 21/11/2017

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