तुम हो

मेरी ज़िंदगी का सुकून , चैन तुम होमेरी ज़िंदगी का जन्म और अंत तुम होकिसी सूत्र में बंधी कविता , गीत , गजल नही होबल्कि दिल से जो निकला है वो सुर तुम होमेरी रातों की तन्हाई में साथ देने वाली तुम होमेरे सूने दिन को बज्म बनाने वाली तुम होजब छुटकारा पाता हूँ दुनिया के तौर तरीकों सेतब मेरे साथ मुझे आराम देने वाली तुम होमैं हर रोज खुदा से माँगता हूँ कि मैं कभी अकेला न रहूँतब तुम्हारी अनुपस्थिति में जो यादें साथ देती है वो तुम होये कोई तरीका नही है दिल का हाल सुनाने काइसकी वजह कुछ नही सिर्फ तुम हो सिर्फ तुम हो कवि – मनुराज वार्ष्णेय

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8 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 18/11/2017
  2. Kajalsoni 19/11/2017
  3. C.M. Sharma 20/11/2017
  4. डी. के. निवातिया 20/11/2017

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