देख विधाता देख!

*देख विधाता देख!..*(सरसी छंद)कभी-कभी उजले दर्पण में,मूरत दिखती एक।पहचानी सी भाव भंगिमा,सूरत लगती नेक।।चन्दन-चन्दन लगती काया,कर्मठता के हाथ।पावन स्निग्ध चरण हैं उसके,ममता उसके साथ।।उसका उजला-उजला आँचल,परियों जैसी शान।अमृत घोली उसकी बोली,मिसरी सी मुस्कान।।एक बार सपने में मुझको,घेर चुकी थी आग।भय के मारे हाल बुरा था,गया अचानक जाग।।ढांढ़स की वो तेरी थपकी,आह!वो तेरा नेह!रोम रोम तेरे ऋण में है,उऋण नहीं ये देह।।तिनका तिनका जोड़ा जिसने,रक्त अंश के पोष|जूठन खा जिसकी आँखों में,देखा मैंने तोष।।तुझको खो देने पर अब है,सूना ये संसार।तेरी माटी के कण-कण में,सौ जन्मों का प्यार।।मन का दर्पण माँ की मूरत,ममता का ये लेख।तुझसे बढ़कर माँ की सूरत, देख विधाता देख।। -‘अरुण’

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7 Comments

  1. Bindeshwar Prasad sharma 15/11/2017
    • अरुण कुमार तिवारी 15/11/2017
  2. C.M. Sharma 16/11/2017
  3. Shishir "Madhukar" 16/11/2017
  4. अरुण कान्त शुक्ला 16/11/2017
  5. ANU MAHESHWARI 16/11/2017
  6. Kajalsoni 19/11/2017

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