निशां तो फिर भी रहते हैं – शिशिर मधुकर

भले ही घाव भर जाएं निशां तो फिर भी रहते हैं मुहब्बत के गमों को आज हम तन्हा ही सहते हैंवो पत्थर हैं ज़माने से कभी कुछ भी नहीं बोला मगर हम उनसे लिपटे आज भी झरने से बहते हैंबड़ी चिंता है दुनिया को कहीं वो बात ना कर लें तभी जज्बात मन के आज वो नज़रों से कहते हैं कटेगी ज़िन्दगी खुशहाल हो बस साथ में उनकेमहल पर अपने ख्वाबों के निरी रेती से ढहते हैंइतनी खुदगर्ज है दुनिया बदलते वक्त में मधुकरकफ़न खुद की मय्यत का हम खुद ही से तहते हैंशिशिर मधुकर

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15 Comments

  1. ANU MAHESHWARI 12/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 13/11/2017
  2. Bindeshwar Prasad sharma 13/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 13/11/2017
  3. C.M. Sharma 13/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 13/11/2017
      • C.M. Sharma 14/11/2017
  4. Madhu tiwari 13/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 13/11/2017
  5. अरुण कान्त शुक्ला 13/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 13/11/2017
  6. डी. के. निवातिया 13/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 13/11/2017
  7. Kajalsoni 19/11/2017
    • Shishir "Madhukar" 19/11/2017

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