इतनी जल्दी क्यों तन्हाइयों में हम रह गए

प्यार के जाल में फँसकर हम रह गएजो सुनते न सुनाते वो बात कह गएहम तो संभले थे एक लंबे अरसे के बादपर तेरी हवाओं में हम फिर से बह गएक्या अजब ही कयामत सी आयी है तूशैल अरमानों के मेरे खड़े ढह गएक्या गजब वो घड़ी थी जब तुमसे मिलेदुनिया आगे निकल गयी हम वही रह गएहँसता चेहरा ही दिखता न दिखती रंजिशेंतेरे हर एक जुल्म को जो हँस के सह गएहम मिला करते थे तुमसे जिस मोड़ परक्यों बैठे है यहां अब भी रास्ते ये कह गएआज तन्हाई भी मुझसे पूछे यहीइतनी जल्दी क्यों तन्हाइयों में हम रह गए कवि – मनुराज वार्ष्णेय

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11 Comments

  1. Madhu tiwari 04/11/2017
  2. Bindeshwar Prasad sharma 04/11/2017
  3. C.M. Sharma 05/11/2017
  4. अरुण कान्त शुक्ला 05/11/2017
  5. अरुण कान्त शुक्ला 05/11/2017
  6. Dknivatiya 06/11/2017

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