दोहे – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

मुख से वाणी प्रीत की मन से बोले आप श्रवण करे चित लाय जो तापर छोडे छाप। करतब का है जानिये मन का मंदिर झांक जल गया तो है दीपक बुझता है तो खाक । त्याग बड़ा है प्रेम से बड़ा दया से दान ज्ञान-वैभव आनन्द है मानवता का शान। संकट में जो साथ रहे है वो मित्र भगवान जो मुख फेरे इस घड़ी तो फिर है शैतान । मंदिर मस्जिद गुरूद्वारा गिरजाघर भी आप दिल में उनको झांक लो होंगे तेरे पास। बेचैनी किस काम की होना है सो होय भाग मत इसके पीछे क्या करोगे रोय। धागे में यह फूल भी देती है सम्मान बिखर गये तो दुख नहीं संहल गये तो शान। पर निंदा एक श्राप है करिये मत ये कामभीतर अपने झांक के कर्म करो निष्काम ।

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7 Comments

  1. C.M. Sharma 01/11/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 01/11/2017
      • C.M. Sharma 01/11/2017
        • C.M. Sharma 01/11/2017
  2. Kiran kapur Gulati 01/11/2017
  3. डी. के. निवातिया 01/11/2017
  4. Madhu tiwari 01/11/2017