एक थी बिटिया,सोन की चिरैया…

एक थी बिटिया,सोन की चिरैया,घर आँगन सुना कर उड़ चली वो गुड़िया।मौसम सी कली मन था केसरिया,खुशबुओं में रंग तलाशती हर वो दूसरी गलियां।सपनो के बीज् से,खिलाती आशाओं की खूबसूरत कलियाँ,तूफाँ भी आ जाते अगर कुम्हलाती नहीं कभी वो रनियां।एक रोज़ शाम ने जब मूंदीं आँखें,और फैली राहों में उसके, कुछ जेहरिली साँसे।क्या जुल्म था उसका जो पाप ऐसा कर दिया,अस्मत से खिलवाड़ किया और लहू रंग चढ़ा दिया,अनसुने चेहरों ने आखिर काट दी वो नाज़ुक टेहनियां,लाल था जोड़ा मगर बनी कभी न वो दुल्हनिया।रात हो गया पर अब है न चंदनिया ,आँगन सो गया पर आई न अब निंदिया।अब यही दुआ है तुझसे,ओ मेरी बेहना,न आना तू लौटकर फिर कभी इस दुनिया।एक थी बिटिया सोन की चिरैया,घर आँगन सुना कर उड़ चली वो गुड़िया। नितेश बनाफर(कुमार आदित्य)

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8 Comments

  1. Madhu tiwari 23/10/2017
  2. C.M. Sharma 24/10/2017
  3. डी. के. निवातिया 24/10/2017
  4. Kajalsoni 25/10/2017

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