वायु के पंछी

वायु के पंछी गीतों के फूल चुनते हैं,बरसात की झड़ी बरसकर फिर व्याकुलता से जाने किसकी राहें देख रहीं,कौन जाने आज गगन का ह्रदय इतनी ज़ोर-ज़ोर क्यूँ धड़क रहा,तुमने स्मरण किया! इसका परिचय देने स्वयं स्नेह के देवतागण आये हैं।जिस तरह सभी जीव-जंतु जन-धन के परे होकर प्रति संध्या नमन करते हैं,जिस तरह नीले अम्बर की हर बूँद कितनी कोमलता से सिंधु में धीरे-धीरे विलीन हो जाती है,हे महाप्रेमी! मेरे सभी अहंकार मिटकर प्राणों के हाथ विस्त्रृत किये हुए हैं,”आज यह जीवन पराधीन हो जाये-” की पुँकार नदियों में लहरें की भाँति उठी है,हम-तुम एक ही अनंत लघु कण में विलीन हो जाएँ,जिसका नाहीं तो कोई रूपांतरण स्वरुप हो और न ही अंत,यह प्राथना अंतिम शेष और केवल शुन्य,और कोई अपरिचित विचार मन में कभी भी उत्पन्न न हो सके।

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2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 20/10/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 21/10/2017

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