दीवाली बीतनी जरुरी है

शीर्षक-दिवाली बीतनी जरुरी हैहम हर साल जलाते हैंरौशनी से भरी मिटटी के दीयेरुई की बातियाँजलती हैं रौशनी के लिएहम जलाते दीयेगणेश लक्ष्मी की मूर्ति के सामनेहम जलाते दीयेघर की चौखट परआंगन की तुलसी परचिढाते है तारो कोऔर कहते है उतर कर देख जमीं परकुछ तारे मेरे घर भी जगमगाते हैपर नहीं जला पाते एक दीपकअपने अन्दर के अँधेरे के लिएइस दिवाली भी अँधेरा हैपिछले दिवाली भी अँधेरा थाआगे भी रहेगाहम लोग रौशनी पसंद लोग हैहमें हर जगह रौशनी चाहिएपर कुछ काम हमारेअँधेरे में भी तो होते हैहमें ना वहां कोई दीपक चाहिएना कोई रौशनी चाहिएदीपो वाली रात बीत जाने दीजिये हुजुरहम और अँधेरा लाने वाले हैहमारी चाहतो के लिए ये जरुरी भी हैउजाला हो या ना होदिवाली बीतना जरुरी है—अभिषेक राजहंस

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2 Comments

  1. C.M. Sharma C.M. Sharma 20/10/2017
  2. Madhu tiwari Madhu tiwari 21/10/2017

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