मैं एक दीपक बन जाऊँगी,,,,,,,,,

अपने कलुषित अंतरतम मेंउज्ज्वल ज्योति जलाऊँगीज्ञान की ओजस किरणों सेमन का अंधकार मिटाऊँगीइस बार दीवाली पर खुद ही मैं एक दीपक बन जाऊँगी,,,,,,,,अम्बर से लेकर अवनि तक चहुँ दिशि उजियारा फैलाऊँगीचाँद-सितारों सी जगमग होगीमैं प्रेम का दीप जलाऊँगीप्रेम के उज्ज्वल दीपक कीमैं खुद ज्योति बन जाऊँगीइस बार दीवाली पर खुद ही मैं एक दीपक बन जाऊँगी,,,,,,,,,ईर्ष्या ,द्वेष, क्रोध और कामहै अंधकार का दूजा नामप्रेम की पावन गंगा के संगइन सब पर विजय पा जाऊँगीजीवन के हर रंगमंच की मैं खुद रंगोली बन जाऊँगीइस बार दीवाली पर खुद ही मैं “दीपावली “बन जाऊँगी,,,,,।सीमा “अपराजिता “

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17 Comments

  1. डी. के. निवातिया 18/10/2017
    • सीमा वर्मा 18/10/2017
  2. sarvajit singh 18/10/2017
    • सीमा वर्मा 18/10/2017
    • सीमा वर्मा 18/10/2017
  3. C.M. Sharma 18/10/2017
  4. सीमा वर्मा 18/10/2017
  5. SALIM RAZA REWA 18/10/2017
    • सीमा वर्मा 21/10/2017
  6. kiran kapur gulati 19/10/2017
    • सीमा वर्मा 21/10/2017
  7. kiran kapur gulati 19/10/2017
  8. अरुण कान्त शुक्ला 20/10/2017
    • सीमा वर्मा 21/10/2017
  9. Shishir "Madhukar" 21/10/2017
    • सीमा वर्मा 21/10/2017

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