अपने हसीन रुख़ से हटा कर निक़ाब को- SALIM RAZA REWA : GAZAL

.. अपने हसीन रुख़ से हटा कर निक़ाब को, शर्मिन्दा कर रहा है कोई माहताब को .कोई गुनाहगार या परहेज़गार हो,रखता है रब सभी केअमल के हिसाब को .उनकी निगाहे नाज़ ने मदहोश कर दिया,मैंने छुआ नहीं है क़सम से शराब को .दिल चाहता है उनको दुआ से नावाज़ दूँ,जब देखता हूँ बाग में खिलते गुलाब को .ये ज़िन्दगी तिलिस्म के जैसी है दोस्तो,क्या देखते नहीं हो बिखरते हुबाब को .जुगनू मुक़ाबले पे न आ जाएं अब कहीं,इस बात ने परेशां किया आफ़ताब को .इन्सान बन गया है “रज़ा” आदमी से वह,दिलसे पढ़ा है जिसने ख़ुदा की किताब को …………………….सलीम रज़ा रीवा

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7 Comments

  1. SALIM RAZA REWA 17/10/2017
  2. Shishir "Madhukar" 18/10/2017
  3. C.M. Sharma 18/10/2017
  4. डी. के. निवातिया 18/10/2017
  5. अरुण कान्त शुक्ला 18/10/2017
  6. Bindeshwar Prasad sharma 18/10/2017

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