माटी का पुतला — डी के निवातिया

माटी का पुतला

हे मानुष !जीता है किस गुमान मेंपलता, बढ़ता हैजाने किस अभिमान में!-!जानकर भी हर कोई अन्जान हैकहते है यही विधि का विधान हैजाने क्यों सत्य में मुख मोड़ता हैजबकि मन मस्तिष्क में संज्ञान है!- !माटी का पुतला होसूखे पत्तो की माफिकजला दिए जाओगे !रह न जाए कोई निशां बाकीअस्थियो संग आहक समेटजल में प्रवाहित किये जाओगे !तत्त्वरूप अवशेष संगइस पृथ्वीमण्डल सेपूर्णतया मिटा दिए जाओगे !चित्त में न हो कोई शंका शेषप्रज्ञा विवेक से शास्त्रानुसारविधि-विधान से निपटाए जाओगे !अन्तत: नाममात्र दिखावे के लिएघर आँगन के किसी दीवार परहार से सुसज्जित कर लटका दिए जाओगे !!!हे प्राणी !यही वास्तविकता हैमेरी भी,और तुम सबकी भी,इससे कैसेमुहँ छिपाओगे !अत:मन मंदिर कोकरो दुरुस्तऔर सुविचारो कोजग में फैलाओकुछ ऐसा तुम कर जाओऔर कुछनहीं रहेगा जग मेंबस इनसे ही पहचाने जाओगे !!

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डी के निवातिया

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18 Comments

  1. Bindeshwar Prasad sharma 17/10/2017
    • डी. के. निवातिया 28/10/2017
  2. Madhu tiwari 17/10/2017
    • डी. के. निवातिया 28/10/2017
  3. Abhishek Rajhans 17/10/2017
    • डी. के. निवातिया 28/10/2017
  4. Shishir "Madhukar" 17/10/2017
    • डी. के. निवातिया 28/10/2017
  5. sarvajit singh 17/10/2017
    • डी. के. निवातिया 28/10/2017
  6. SALIM RAZA REWA 17/10/2017
    • डी. के. निवातिया 28/10/2017
  7. Rajeev Gupta 17/10/2017
    • डी. के. निवातिया 28/10/2017
  8. C.M. Sharma 18/10/2017
    • डी. के. निवातिया 28/10/2017
  9. kiran kapur gulati 18/10/2017
    • डी. के. निवातिया 28/10/2017

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