दो दूना बाइस — डी के निवातिया

दो दूना बाईस

बेवजह में वजह ढूंढने की गुंज़ाइश चाहिये !काम हो न हो पर होने की नुमाइश चाहिये !!

कौन कितना खरा है, किसमे कितनी खोट !पहले इस बात की होनी आजमाइश चाहिये !!

दिखावे के दौड़ में शामिल है हर कोई शख्श !तबज्जो पाने के लिए नई फरमाइश चाहिये !!

इंसान इस कद्र आमादा है अपनी गंगा बहाने को !ढहे मंदिर या मस्जिद, नपी-तुली पैमाइश चाहिये !!

कटे किसी की गर्दन, या शूली चढ़ाया जाये ! किसी भी हाल पूरी अपनी ख्वाहिश चाहिये !

मुफ्त में बना देंगे खुदा का रहबर हर किसी कोशर्त ये है मगर, रईसी में होनी पैदाइश चाहिये !!

कौन चाहता है “धर्म” के फल कर्मानुसार मिले !बिन हेर-फेर सीधे सीधे दो दूना बाईस चाहिये !!!!!डी के निवातिया

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16 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 12/10/2017
    • डी. के. निवातिया 24/10/2017
  2. C.M. Sharma 12/10/2017
    • डी. के. निवातिया 24/10/2017
  3. Arun Kant Shukla 12/10/2017
    • डी. के. निवातिया 24/10/2017
  4. Arun Kant Shukla 12/10/2017
    • डी. के. निवातिया 24/10/2017
  5. Anu Maheshwari 12/10/2017
    • डी. के. निवातिया 24/10/2017
  6. kiran kapur gulati 13/10/2017
    • डी. के. निवातिया 24/10/2017
  7. Bindeshwar Prasad sharma 13/10/2017
    • डी. के. निवातिया 24/10/2017
  8. sarvajit singh 13/10/2017
    • डी. के. निवातिया 24/10/2017

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