बूढ़ा बरगद – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा (बिन्दु)

मैं बूढ़ा बरगद कब जन्मा,याद नहीं मंदिर के पास हूँ पास एक कुंआ है चौराहे पर खड़ा अपनी भुजाओं को फैलाये न जाने कब से हूँ .कुछ पता नहीं धुंधली सी याद है तो लालधारी बाबा जिसने मुझे जवान किया .राहगीर आते थकान पूरी करते पानी पीकर निकल जाते. किसी की मर्जी हुईतो मंदिर जाते बाबा के पैर छूते दयालु कुछ देते कुछ ऐसे निकाल जाते. बाबा का आशीर्वाद लग जाता जो बोलते वह पूरी हो जाती .बाबा मेरे सामने स्वर्ग सिधार गये में खड़ा देखता रहा कुछ न कर पाया. उसी ने सेवा – भक्ति सिखाई जीने को बताया सत्य और सरल मार्ग का अवलोकन कराया भूल गये सबबूढ़ा जो हो गया . मेरा मूल किधर है मेरी वास्तविकता क्या है मैं नहीं जानता जड़े कितनी फैली है असली-नकली का पता ही नहीं मैं भी नहीं जानता .मेरे शरीर फैलते गये कितनी ही आंधियां देखी कितने ठंढ़ महसूस किये बरसातें आई चली गईं. अकेला मैं अडिग रहा कितने धूप खाए सूर्य का तपीश सहापर शितलता देने में कसर नहीं छोड़ी .पास गांव वाले बुजुर्ग-बच्चे मेरे ही गोद में खेलते रहे लेते रहे मजे तब मैं बहुत खुश होता राहगीर आते धंटो बैठकर-लेटकर आराम करते तब मैं बाबा को दिल से याद करता लोग कहते बाबा लालधारी आज भी जिंदा हैं.

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16 Comments

  1. Madhu tiwari 08/10/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 09/10/2017
  2. SALIM RAZA REWA 08/10/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 09/10/2017
  3. Shishir "Madhukar" 08/10/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 09/10/2017
  4. sarvajit singh 08/10/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 09/10/2017
  5. C.M. Sharma 09/10/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 09/10/2017
  6. अरुण कान्त शुक्ला 09/10/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 09/10/2017
  7. Anu Maheshwari 09/10/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 09/10/2017
  8. डी. के. निवातिया 12/10/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 13/10/2017

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