ज़रूरतों के मुताबिक़

ज़रूरतों के मुताबिक़ ज़िन्दगी ज़िया करते हैं,

ख़्वाहिशों के मुताबिक़ नहीं ज़िया करते हैं।

ज़रूरतें तो ग़रीबों की भी पूरी हो जाती हैं,

ख्वाहिशें, बादशाहों की भी अधूरी रह जाती हैं।

-सर्वेश कुमार मारुत

6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 07/10/2017
  2. kiran kapur gulati 08/10/2017
  3. sarvajit singh 08/10/2017
  4. Madhu tiwari 08/10/2017
  5. Bindeshwar prasad sharma 08/10/2017
  6. C.M. Sharma 09/10/2017

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