शरद की वो रात

शरद की वो रातशरद की वो रातआज वापस ला दोआसमान से बरसती काली राखबस आज रुकवा दोबन चुकी है खीर घर मेंउसे कैसे रखूं मैंखुले आसमां के नीचेऐ चाँद एक काम करोआज मेरे चौके में ही आ जाओऔर बूँद दो बूँद अमृतउसमें टपका दोअरुण कान्त शुक्ला, 5 अक्टोबर, 2017

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7 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 06/10/2017
  2. kiran kapur gulati 06/10/2017
  3. C.M. Sharma 06/10/2017
  4. डी. के. निवातिया 06/10/2017
  5. अरुण कान्त शुक्ला 06/10/2017
  6. sarvajit singh 06/10/2017
  7. Madhu tiwari 07/10/2017

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